कौन हो तुम

13 02 2007

कौन हो तुम..

शीशे में एक अक्स सा लहराया था,
गौर से देखा तो हमारी परछाई नहीं,तस्वीर थी तेरी ।

राह में जब ठंडी हवा के झोंके आए चेहरे पर,
तो लगा,घनी ज़ुल्फ़ों की छांव हो तेरी ।

अधखुली आंखो ने देखी जब चांदनी
महसूस हुआ ये मुस्कान है तेरी ।

दिल मेरा अक्सर अपने से करता है जब बातें,
कान सुनने लगते हैं आवाज़ तेरी ।

धूप में निकलता हुं जब भी,
नज़रें ढुंढने लगती है परछाई तेरी