कभी-कभी

20 02 2007

कभी-कभी

क्यों होता है ऐसा कभी-कभी
कि कुछ सोचना भी भारी लगे
और सोचे बिना रहा न जाए!

क्यों होता है ऐसा कभी-कभी
लगे ऐसा मानों हाथ-पैरों में जान न हो!

क्यों होता है ऐसा कभी-कभी
कि व्यर्थ सा लगे सब कुछ!

क्यों होता है ऐसा कभी-कभी
कि मन लगे उदास-उदास!

क्यों होता है ऐसा कभी-कभी
कि आंख भर आए अपने-आप बिना कारण!

क्यों होता है ऐसा कभी-कभी
कि तमन्ना भी नहीं रहती बाकी!

क्यों होता है ऐसा कभी-कभी
खाली सा हो जाता है दिमाग भी!


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10 responses to “कभी-कभी”

20 02 2007
baaniagrawal (15:29:11) :

Kabhi Kabhi ….yeh jo likha hai aapne har vyakti ke jeevan mai aise pal aate hai…beautifully written…but kuch adhura sa lag raha hai…if possible add more to it..

20 02 2007
hiren4u (17:21:23) :

ek aur badhiya kavita

20 02 2007
tanya (19:11:19) :

aapki har kavita apni apni jagah hai par ye kavita mere dil ko kuch is tarah chu gayi kyunki ye shayad sabhi ke saath hota hai……..human nature………specially mere saath……..remarkable……..ty so much cb

20 02 2007
vaishali (20:02:08) :

jab kabhi insaan swayam ke baare me sochne lagta hai na tab aisa hi hota hai

आंख भर आए अपने-आप बिना कारण!
ya

कि मन लगे उदास-उदास!

bahut khoob sanjeet bahut hi achha likha hai

20 02 2007
manya (20:39:49) :

बिल्कुल सही कहा है आपने ऐसा कई बार होता है.. पर क्यॊं पता नहीं ..

21 02 2007
समीर लाल (02:30:30) :

इस स्थिती को चिकित्सा शास्त्र में डिप्रेशन और धर्म शास्त्र में आत्म मंथन की स्थिती बताया गया है. मगर साहित्य में इसे भावुक लेख और भावुक कवितायें लिखने की सर्वोत्तम स्थिती माना गया है. एक से एक कविता लिख जाती हैं, ऐसे महौल में. मैने तो खुद लिखकर देखा है लेख और कविता दोनों. बिल्कुल भाई, ऐसा ही माहौल था, बड़ी हिट गई वो रचनायें. ऐसी हिट कि मुँह से निकल पड़ा, अह्हा, आनन्दम, आननदम!! और हम महौल के बाहर. फिर नार्मल सा लिखने लगे. अब तो इंतजार लगा रहता है कि कब यह माहौल फिर मिले. :)
लिख मारो दो चार कविता और, बेहतरीन जायेंगी, जैसे यह उपर वाली.इसकी तो बधाई अभी ले लो!! :)

–मजाक अलग, वैसे यह सबके साथ होता रहता है. अपनी पसंदीदा चीजों में मन लगाओ, निकल जाओगे इस स्थिती से. लंबे समय तक इस स्थिती में रहना अच्छा नहीं. युवा हो अभी, हँसी खुशी से दिन काटो मजे में. :)

21 02 2007
रीतेश गुप्ता (03:14:39) :

अच्छी सीधी सपाट रचना के लिये बधाई !!!!

21 02 2007
संजीत त्रिपाठी (13:04:26) :

4- समीर जी को धन्यवाद, कविता का सही विश्लेषण करने के लिए। चुंकि आप “गुरू” हो। आपकी सलाह सिर आंखो पर , निवेदन बस इतना है कि यह उपर कविता जैसा जो कुछ मैने लिखा है वह सालों पहले लिखा था, वर्तमान में इस हालत मे नहीं हूं, ऐसे हालात अक्सर आते और जाते रहते है, दुआ है दोस्तों की, कि इस हालात से आगे की हालत में नही पहुंचा अभी तक अर्थात डिप्रेशन में.
पुन: धन्यवाद समीर जी

21 02 2007
Shrish (20:58:20) :

अरे भैया इस स्थिति को ‘लवेरिया’ कहते हैं, संजीत भाई को लवेरिया हुआ…

23 02 2007

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