कुछ विचार “राम” पर

19 02 2007

एक

राम!
तुम भगवान न थे
तुम तो थे,प्रतीक मात्र
और हो!
दीन-हीन जनों के संबल का
विश्वास का!
उस धर्म-मर्यादित आचरण के
जिसके कारण तुमने भोगा
चौदह सालों का वनवास
और
उपहार मिला तुम्हे
सीता विछोह का

राम!
तुम भगवान न थे
तुम तो थे प्रतीक मात्र
और हो
पुत्र धर्म के
प्रजा के पालनहार सत्यनिष्ठ राजा के!

कौन कहता है तुम भगवान थे
तुम तो इंसान ही थे
तभी तो पूजा था तुमने शिव को!
ये और बात है कि तुम “आदर्श” थे
तुम्हारे कर्मों ने तुम्हे हमसे ऊंचा उठा दिया
इतना ऊंचा कि
तुम भगवान के समकक्ष हो गए
पूजे जाने लगे
भगवान कहलाने लगे
राम!
तुम इंसान ही क्यों न रहे!

———————————————————————————————————-
दो

राम!
तुम्हारा नाम
लक्ष्मण या कुछ और होता
तो क्या
तुम वह सब ना करते
जो तुमने किया!

———————————————————————————————————–

तीन

राम!
कभी-कभी
तो लगता है
तुम भगवान ही थे
इंसान नही
क्योंकि
जिस सीता के लिए
तुमने लंका का नाश किया
उसे!
उसे ही तुमने त्याग दिया
इंसान तो ऐसा नहीं कर सकता!

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9 responses

19 02 2007
baaniagrawal

well once again u have proved that nothing can stop you from speaking out your mind….chahe woh ek sensitive issue hi kyo na ho…thoughts very beautifully and strongly executed…awesome SANJEET…

19 02 2007
vaishali

bahut hi achha likha hai sanjeet ye tumne…….राम!
कभी-कभी
तो लगता है
तुम भगवान ही थे
इंसान नही
क्योंकि
जिस सीता के लिए
तुमने लंका का नाश किया
उसे!
उसे ही तुमने त्याग दिया
इंसान तो ऐसा नहीं कर सकता!

sach kaha tumne insaan aisa nahin ker sakta………
best of luck for ur future…..

20 02 2007
ronit mishra

sanjeet bhai wah bhut acha likha hai apne app aise hi likhte rahi hai aur apki sare manokamna puree ho (reporter wali) aur baki sab bhi hum apko aise hi pyre karti rahengi wah guru wah maza agya pard kar (spelling mistake hogi dont mind plz )

20 02 2007
ghughutibasuti

संजीत जी बहुत अच्छा लिखा है। आपक कविताएँ सोचने को बाध्य करती हैं ।
कह नहीं सकती कि भगवान थे या मनुष्य ,पर कुछ ऐसे थे जो समझ में न आएँ । यदि सीता को वनवास ही देना था तो क्या आवश्यकता थी लंका तहस नहस करने की, रावण का वध करने की ?क्या अशोक वाटिका इतनी बुरी थी कि उन्हें अपने राज्य के वन में लाकर छोड़ दिया ? खैर जो भी हो, हमारा सौभाग्य है कि आज के पुरुष राम नहीं हैं ।
घुघूती बासूती
ghughutibasuti.blogspot.com
miredmiragemusings.blogspot.com/

20 02 2007
tanya

abhi tak ki sabse acchi kavita mujhe ye lagi aapki cb……………sochne par majboor ho gaye sab ki RAM ji BHAGWAN the ya saadharan manushya……….jo bhi ho aapki kaviitayen padhna hum sabhi ki khush kismati hai……… ur most valueable work…..really commendable

21 02 2007
संजीत त्रिपाठी

1- धन्यवाद वैशाली, बानी और रोनित जी।
2- घुघूती बासूती जी धन्यवाद, यही कुछ सवाल हैं जो अक्सर दिलो-दिमाग मे घुमड़ते रहते हैं। और हां जैसा कि आपने लिखा कि आज की महिलाओं का सौभाग्य है कि आज के पुरुष राम नहीं है, आप जिस संदर्भ में कहना चाह रही है समझ में आ गया लेकिन एक सवाल उठा मन में कि चूंकि आज की नारी सीता नहीं है यह आज के पुरुष के लिए सौभाग्य की बात है या दुर्भाग्य की?………अन्यथा न लें यह सवाल सिर्फ़ अपनी विनोदी प्रवृति के कारण दिमाग में आया।

21 02 2007
संजीत त्रिपाठी

शुक्रिया तान्या

25 02 2007
Sonal

श्री राम के बारे में आपने खूब लिखा है.श्री राम एक आदर्श पुरुष थे या भगवान, या हमारी तरह एक साधारण इनसान जिससे गलतियां होती है, सामझ पाना मुश्किल है.परंतु आपाकी कवितायें कुछ संकेत तो ज़रूर देती है, बहुत अच्छा लगा पढ़कर.

4 03 2007
Aman

Sanjeet Bhaiya very well presented peom.. Harr kavita mai itne interest se nahi padhta aur comment nahi karta.. lekin this work of yours had to be appreciated.. Good work bhaiye.. Keep it up.. Take Care.. God Bless You..

Regards..

Aman..

[URL=http://imageshack.us][IMG]http://img515.imageshack.us/img515/4616/tiibsbp2.gif[/IMG][/URL]

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