अपना चिट्ठा अब वर्डप्रेस की बजाय ब्लॉगर में

17 03 2007

ई-पंडित श्रीश मास्साब के नक्शे-कदम पर चलते हुए अपन ने तय किया कि अपना चिट्ठा वर्डप्रेस से ब्लॉगर में ले जाएं।
मेरे नए चिट्ठे का कड़ी या लिंक है
http://sanjeettripathi.blogspot.com/
नए चिट्ठे पर जाने से पहले धन्यवाद श्रीष मास्साब का जिनके पुरालेखों को पढ़-पढ़ कर मैनें बहुत कुछ सीखा, और सीखने की प्रक्रिया अभी जारी ही है।

नए चिट्ठे की सूचना नारद मुनि को भेज रहा हूं पंजीकरण के लिए,  आदि पत्रकार नारद मुनि का आशीर्वाद लेना ज्यादा जरुरी है।

यह पोस्ट सूचनार्थ
तो फ़िर मिलते हैं नए चिट्ठे पर





सभी को होली की रंगारंग शुभकामनाएं

3 03 2007

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जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की
परियों के रंग दमकते हों
ख़ुम शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे में छकते हों
जब फागुन रंग झमकते हों
नाच रंगीली परियों का
कुछ भीगी तानें होली की
कुछ तबले खड़कें रंग भरे
कुछ घुँघरू ताल छनकते हों
जब फागुन रंग झमकते हों
मुँह लाल गुलाबी आँखें हों
और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिholi3.gifचकारी को
                                                अँगिया पर तक के मारी हो
                                              सीनों से रंग ढलकते हों
                                                  तब देख बहारें होली की
                                               जब फागुन रंग झमकते हों
                                      तब देख बहारें होली की
                                                                        –नज़ीर अकबराबादी





मेरे बारे मे

11 02 2007

 “बुरा जो देखण मैं चला,बुरा ना मिलया कोय,
   जो मन खोजा आपणा तो मुझसे बुरा ना कोय”

भीड़ मे रहकर भी भीड़ से अलग रहना मुझे पसंद है……कभी-कभी सोचता हुं कि मैं जुदा हुं दुसरों से,पर मेरे आसपास का ताना-बाना जल्द ही मुझे इस बात का एहसास करवा देता है कि नहीं,मैं दुसरों से भिन्न नहीं बल्कि उनमें से ही एक हुं…!
                                      नाम मेरा संजीत त्रिपाठी है, जन्मा रायपुर, छत्तीसगढ़ मे। यहीं पला-बढ़ा,पढ़ा-लिखा और एक आम भारतीय की तरह जिस शहर में जन्मा और पला-बढ़ा वहीं ज़िन्दगी गुज़र रही है। छात्र जीवन से ही स्वभाव में उत्सुकता कुछ ज्यादा थी सो रुझान पत्रकारिता की ओर हुआ। कुछ साल जनसत्ता, नव-भारत, अम्रत-संदेश जैसे राष्ट्रीय और स्थानीय अखबारों में बतौर सिटी रिपोर्टर व असिस्टेंट सब-एडिटर रहा, फ़िर व्यक्तिगत व सामयिक मज़बूरियों के चलते या दुसरे शब्दों मे कहुं तो अपनी शहर ना छोड़ पाने की कायरता के चलते पत्रकारिता से सन्यास ( इसे मैं सन्यास ही कहना चाहुंगा ) लेकर फ़िलहाल एक छोटा सा बिज़नेस कर रहा हुं। यह अलग बात है कि  बिज़नेस की आपाधापी के बीच मेरा पत्रकार मन कभी-कभी अपने आप मे अजनबी सा महसुस करता है।
                                              जन्मा मैं एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार में, दादा व पिता जी दोनो ही स्वतंत्रता सेनानी थे सो राष्ट्र और राष्ट्रीयता की बातें एक तरह से मुझे घुट्टी में ही मिली। घर में पिता व बड़े भाई साहब  को पढ़ने का शौक था सो किताबों से अपनी भी दोस्ती बचपन से ही हो गई। आज भी पढ़ना ही ज्यादा होता है, लिखना बहुत कम्।
 लब्बो-लुआब यह कि मैं एक आम भारतीय हुं जिसकी योग्यता भी सिर्फ़ यही है कि वह एक आम भारतीय है जिसे यह नहीं मालुम कि आम से ख़ास बनने के लिए क्या किया जाए फ़िर भी वह आम से ख़ास बनने की कोशिश करता ही रहता है…।